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अहीर ( यादव ) राव राजाओं के अदम्य साहस का दिन है 16 नवंबर

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कृष्ण कुमार, रेवाड़ी : जिस तरह हरियाणा वीर एवं शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में 23 सितंबर को शहीदों का भावपूर्ण स्मरण किया जाता है, उसी तरह 16 नवंबर का दिन भी शहादत के इतिहास में अहम स्थान रखता है। यह अंग्रेजों से लोहा लेने वाले राव राजाओं के अदम्य साहस को नमन करने का दिन है। नसीबपुर के मैदान में आज ही के दिन 1857 में रामपुरा के राजा राव तुलाराम व अमर शहीद राव गोपालदेव सहित हजारों वीरों ने मां भारती की आजादी के लिए अंग्रेजों से युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में पांच हजार अनाम सैनिकों ने शहादत दी थी।

यहां के वीरों ने अंतिम सांस तक ब्रिटिश शासकों के खिलाफ संघर्ष किया था। स्वतंत्रता संग्राम के महानायक राव तुलाराम ने जहां मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही राजकाज संभालकर अपनी सूझबूझ से अंग्रेजों की घेराबंदी की थी, वहीं राव गोपालदेव ने युद्ध के बाद अंग्रेजों की ओर से की गई सशर्त माफीनामे की पेशकश को ठुकरा दिया था। बेशक मेरठ से उठी क्रांति की ज्वाला रेवाड़ी-नसीबपुर पहुंचने के बावजूद आजादी नहीं दिला पाई थी लेकिन यह भी सच है कि राव राजाओं ने 1857 की क्रांति को कामयाब बनाने के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष किया।

क्रांतिकारी थे राजा राव तुलाराम

राव तुलाराम का जन्म 9 सितंबर 1825 को रेवाड़ी के राज परिवार में हुआ था। राव तुलाराम ने जिस समय होश संभाला, तब मातृभूमि पर अंग्रेजों का शासन था। बचपन में ही पिता पूर्ण ¨सह का साया सिर से उठने के कारण बालक तुलाराम का लालन-पालन उनकी माता ज्ञानकंवर की देख रेख में हुआ था। पिता का साया सिर से उठने पर राव तुलाराम को मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही राजगद्दी सौंपी गई थी। इस बीच जब मई 1857 की क्रांति की लहर अहीरवाल क्षेत्र में पहुंची तब राव राजा ने भी क्रांति का बिगुल बजा दिया। राव तुलाराम ने इस इलाके से अंग्रेजी सेना के खिलाफ संघर्ष का एलान कर दिया था। क्रांतिकारी नेताओं ने दिल्ली के ¨सहासन पर कब्जा कर बहादुरशाह जफर को ¨हदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। अंग्रेज गुड़गांव व आसपास का इलाका छोड़ कर भाग गए तथा इस पूरे इलाके पर राव तुलाराम का शासन कायम हो गया। गुस्साये अंग्रेजों ने संगठित होकर राव तुलाराम को घेरने की कोशिश की। इस दौरान ही 16 नवंबर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजों व भारतीय योद्धाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस लड़ाई में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। राव तुलाराम अंग्रेजी सेना को चकमा देकर भेष बदलकर अपने विश्वसनीय साथियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ मदद मांगने के लिए काबुल पहुंच गए, परंतु भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। काबुल पहुंचकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चाबंदी मजबूत करने से पहले ही उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। 23 सितंबर 1863 को आजादी का यह महानायक सदा के लिए सो गया, परंतु आजादी की जो ¨चगारी उन्होंने सुलगाई थी, वहीं भविष्य में ज्वाला बनकर देश को आजाद कराने का कारण बनी।

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महान योद्धा थे राजा गोपाल देव

अहीरवाल क्षेत्र के वीर 1857 की क्रांति से लेकर अब तक देश की रक्षा के लिए अपनी प्राण न्योछावर करने से पीछे नहीं रहे। 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वालों में अहीरवाल की सरजमीं पर पैदा हुए राजा राव गोपाल देव का नाम भी सम्मान के साथ लिया जाता है। इस महान योद्धा ने ब्रिटिश शासन द्वारा दी गई माफीनामे की पेशकश ठुकरा दी थी। इसी कारण राव गोपालदेव का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। कहा जाता है कि राव तुलाराम व राव गोपाल देव जैसे आजादी के नायकों ने 10 मई 1857 को ही देश के सुविख्यात क्रांतिकारियों के सहयोग से मेरठ को आजाद करा लिया होता, परंतु फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते हुए अंग्रेजों ने राव राजाओं की शक्ति को कमजोर करने की रणनीति पर काम जारी रखा। इसी कारण उस समय कामयाबी नहीं मिली। राव गोपालदेव इस नीति को समझते थे। अंग्रेजों की नजर में राव गोपाल देव बागी थे। अंग्रेजों से बदला लेने के लिए उन्होंने अंबाला सहित अन्य स्थानों पर सक्रियता बढ़ाई। मेरठ के आजाद होने के बाद 11 मई 1857 को यहां के क्रांतिकारियों ने बादशाह बहादुरशाह जफर के साथ मंत्रणा की। क्रांति की भड़कती लपटों को देखकर 13 मई को तत्कालीन अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर विलियन फोर्ड घबराकर अपने अफसरों के साथ गुड़गांव छोड़ कर भाग खड़ा हुआ व भोंडसी-पलवल के रास्ते मथुरा पहुंच गया।

इस बीच उन्हीं दिनों दूसरी तरफ मेजर विलियम एडन जयपुर की सेना के बल पर दिल्ली जाकर क्रांतिकारियों को दबाने की साजिश रच रहा था लेकिन उसके कई वफादार साथी राव राजाओं से आ मिले। इस कारण एडन निराश होकर अगस्त में वापिस लौट गया। कुछ समय के बाद ब्रिगेडियर शावर्स ने डेढ़ हजार सैनिकों के साथ 7 अक्टूबर 1857 को रेवाड़ी पर हमला कर दिया। राव गोपाल देव अपने महल रानी की ड्योढ़ी से गोकलगढ़ तक बने सुरंग के रास्ते अपने किले में पहुंच गये। गोकलगढ़ किले में पहुंचकर राव राजा गोपालदेव ने ब्रिगेडियर शॅावर्स की सेना से मुकाबला किया। अंग्रेजों को भागना पड़ा।

क्रांतिकारियों से खार खाई अंग्रेजी हकूमत ने इसके बाद एक विशाल सेना तोपखाने के साथ कर्नल जेजे जेराड के नेतृत्व में भेजी। जानकारी मिलने पर जोधपुर (शेखावटी) के विद्रोही सैनिक दस्ते, झज्जर के अब्दुल समद खां व हिसार के शहजादा मुहम्मद आजम जैसे क्रांतिकारी व देशभक्त अपनी सैन्य शक्ति सहित राव राजाओं से आ मिले। अमर शहीद राव तुलाराम पहले ही अपनी शक्ति बढ़ाने में जुटे हुए थे। उन्हें भी अंग्रेजों के दांत खट्टे करने का इंतजार था। 16 नवंबर 1857 को क्रांतिकारियों व अंग्रेजी सेना के बीच नसीबपुर के मैदान में भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में राव गोपालदेव ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया। रेवाड़ी में राव तुलाराम की स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए जहां नाईवाली चौक पर उनकी प्रतिमा लगाई गई है, वहीं गोपालदेव की याद को जीवंत रखने के लिए नारनौल रोड पर उनकी विशाल प्रतिमा लगवाई गई है। कहा जाता है कि गोपालदेव के सामने अंग्रेजों ने सर्शत माफी की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था।

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राव राजाओं के अदम्य साहस का दिन है 16 नवंबर[/expand]

नसीबपुर में दी थी पाच हजार वीरों ( अहीरों ) ने शहादत

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास नारनौल क्षेत्र के गाव नसीबपुर का जिक्र किए बिना अधूरा है, क्योंकि नसीबपुर स्थित जंग-ए-मैदान में ही क्राति के दौरान यहा के सैनिकों ने अपनी कुर्बानी दी थी।

नारनौल। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास नारनौल क्षेत्र के गाव नसीबपुर का जिक्र किए बिना अधूरा है, क्योंकि नसीबपुर स्थित जंग-ए-मैदान में ही सन् 1857 की क्राति के दौरान यहा के 5 हजार अनाम सैनिकों ने अपनी कुर्बानी दी थी।

हालाकि 16 नवंबर सन् 1857 को हुए इस युद्ध में राजा राव तुलाराम व राव कृष्णा गोपाल जैसे कई महान योद्धा भी अगुवाई करने के लिए डटे हुए थे, परंतु उन 5 हजार अनाम वीरों की गौरवगाथा भी आजादी के इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगी, जिन्होंने मा भारती की आजादी के लिए युद्ध भूमि में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए कुर्बानी दी थी। यह अलग बात है कि आजादी की क्राति के इतिहास में इन राष्ट्रभक्तों की कुर्बानी को वैसा महत्व नहीं मिल पाया, जिसके वे हकदार थे। अंग्रेजों ने तो इस क्रांति को 1857 का गदर, बगावत और विद्रोह जैसे नाम दिए थे, परंतु वास्तव में यहा हुई रक्तिम क्राति ही देश के स्वतंत्रता संग्राम की नींव मानी जाती है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक राव तुलाराम जी थे । प्रथम स्वतंत्रता की सर्वप्रथम लड़ाई 10 मई 1857 को राव तुलाराम और अंग्रेज़ो के बीच हुए। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक का जन्म रेवाड़ी के यादव राजघराने में हुआ था.

नसीबपुर के जंग-ए-मैदान की रक्तिम माटी आज भी उस बलिदान की गवाह है। इस युद्ध के बारे में खुद अंग्रेज लेखक मालेसन ने कहा था कि-हिन्दुस्तानी सैनिक इतनी वीरता के साथ इससे पहले कभी नहीं लड़े। अंग्रेजी फौज की ऐसी विकट टक्कर किसी दुश्मन से नहीं हुई होगी।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 1857 की क्राति को दबा कर अंग्रेजों ने 20 सितंबर 1857 को दिल्ली पर फिर से अधिकार कर लिया था, लेकिन वर्तमान दक्षिणी हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में आजादी की ज्वाला कमजोर नहीं पड़ी थी। राव राजाओं के साथ कुछ अन्य रजवाड़े भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के लिए कटिबद्ध थे। इन्हें सबक सिखाने के लिए जनरल शॉवर्स ने रेवाड़ी पर हमला करने के लिए दो अक्टूबर 1857 को एक फौजी टुकड़ी के साथ दिल्ली से कूच किया।

शावर्स की शक्ति व इरादों की भनक लगने पर राव तुलाराम ने युद्ध के लिए अनुपयुक्त रामपुरा किले को छोड़ दिया और राजस्थान की तरफ निकल गए। रामपुरा किले को खाली पाकर हताश शावर्स कानोड़ (महेंद्रगढ़) की तरफ निकल गया। कानोड़ का किलेदार अंग्रेजों का वफादार माना जाता था। इस दौरान राव तुलाराम ने जोधपुर के विद्रोही सैनिकों से मिलकर न केवल अपनी शक्ति में इजाफा किया बल्कि रेवाड़ी पर भी फिर से अधिकार कर लिया।

अंग्रेजों ने खबर लगने पर कर्नल जेरार्ड को राव तुलाराम को कुचलने व रेवाड़ी पर अधिकार करने के लिए भेजा। सामरिक दृष्टि से नारनौल की स्थिति रेवाड़ी से बेहतर मानकर राव तुलाराम नारनौल पहुंचे। हिसार के मोहम्मद आजम और झज्जर के अब्दुल समद खा भी वहीं मिल गए।

सभी क्रातिकारियों ने सराय नामक एक विशाल भवन में मोर्चा ले लिया, क्योंकि सराय एक मजबूत किलेनुमा भवन था, जो युद्ध की दृष्टि से काफी उपयोगी था। जेरार्ड की हिम्मत जवाब दे गई। उसने अतिरिक्त सैनिक बुला लिए। एक पूरे तोपखाने के साथ नारनौल पर आक्रमण के लिए कूच कर दिया। लगभग 12 घटे के थका देने वाले सफर के बाद जेरार्ड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने नारनौल से तीन किलोमीटर दूर नसीबपुर के मैदान में पड़ाव डाल दिया।

जब राव तुलाराम व अन्य भारतीय वीरों को अंग्रेजों के नसीबपुर में पड़ाव की खबर मिली, तो जंग के लिए तैयार बैठे हिन्दुस्तानी सैनिक भी अपना मोर्चा छोड़ कर नसीबपुर पहुंच गए। यह बड़ी भूल थी, क्योंकि सराय युद्ध की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण थी, परंतु भारतीय सैनिक भारी जोश में थे। आक्रमण होते ही फिरंगियों की सेना में भगदड़ मच गई। कर्नल जेरार्ड भी गोली लगने से ढेर हो गया। अंग्रेजी सेना बिखर गई, परंतु अंग्रेजों ने तोपखाने का मुंह खोल दिया।

इससे भारतीय सेना संभल नहीं पाई। बेशक भारतीय जवान इस युद्ध के बल पर उस समय आजादी हासिल नहीं कर पाए, लेकिन नसीबपुर के मैदान में दिया गया उन रणबाकुरों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी दिखाई संघर्ष की राह पर चलकर ही भारत मा के अमर सपूतों ने 15 अगस्त 1947 को देश को आजाद करवाकर ही चैन लिया।

[expand title=”Refrences”]नसीबपुर में दी थी पाच हजार वीरों ने शहादत[/expand]

इतिहास चोरों का राय

वैसे इतिहास चोरो का इनपर अलग अलग मत है कोई इतिहास चोर इन्हें राजपूत बताने लगते हैं , परन्तु कुछ कुछ जो ये जान जाते हैं कि इनकी इतिहास की चोरी हमारे द्वारा नहीं की जा सकती तो राव तुलाराम जी का तिरस्कार करने लगते हैं। क्योंकी उनके बाप दादाओं ने अंग्रेज़ो और मुगलों के तलवे चाटे थे।

FAQs :

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक कौन थे?

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक राव तुलाराम जी थे । प्रथम स्वतंत्रता की सर्वप्रथम लड़ाई 10 मई 1857 को राव तुलाराम और अंग्रेज़ो के बीच हुए। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक का जन्म रेवाड़ी के यादव राजघराने में हुआ था.

नसीबपुर की लड़ाई के पश्चात राव तुला राम किसकी सेना चले गए थे?

नसीबपुर मे हुए युद्ध में घायल राजा राव तुलाराम राजस्थान चले गए, ठीक होने के बाद वे रूस से सैनिक सहायता लेने गए थे।

कितने वर्ष की आयु में राव तुलाराम राजगद्दी पर बैठे थे?

14 साल की उम्र में संभाली थी राजगद्दीअंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे उनकी आधी से अधिक रियासत पर कब्ज़ा कर लिया था. फिरंगियों की इस हरकत के बाद राव तुलाराम का ख़ून खौलना लाज़मी था. उन्होंने धीरे-धीरे अपनी एक सेना तैयार की. रेवाड़ी के लोगों ने भी इसमें योगदान दिया.

भारत सरकार ने राव तुला राम पर डाक टिकट कब जारी किया था?

23 सितम्बर 2001, को भारत सरकार ने महाराजा राव तुलाराम की स्मृति में डाक टिकेट जारी किया।

राव तुला राम के भाई का क्या नाम था जिन्होंने उनकी सेना की कमान संभाली थी?

गोपालदेव

राव तुला राम को हराने के लिए अक्टूबर 1857 में अंग्रेजों ने किस जनरल को युद्ध के लिए रेवाड़ी भेजा था?

अंग्रेज अब यह समझ चुके थे कि राव तुलाराम पर काबू पाए बिना वे चैन से दिल्ली पर शासन नहीं कर सकते इसलिए राव तुलाराम को तहस-नहस करने के लिए 2 अक्टू बर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोबर्स एक भारी सेना तोपखाने सहित लेकर रेवाड़ी की ओर बढ़े तथा 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी में उनकी झड़प राव तुलाराम की एक सैनिक टुकड़ी से हुई.

16 नवंबर 1857 को अंग्रेजों और राव तुला राम की सेना के बीच भीषण जंग किस स्थान पर हुई थी?

गुस्साये अंग्रेजों ने संगठित होकर राव तुलाराम को घेरने की कोशिश की। इस दौरान ही 16 नवंबर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजों व भारतीय योद्धाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस लड़ाई में अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।


राव तुला राम: 1857 की क्रांति का वो योद्धा जिसने एक महीने तक अंग्रेज़ों को अपने गढ़ में उलझाए रखा

राव तुला राम मार्ग, राव तुला राम अस्पताल, कॉलेज और राव तुला राम फ़्लाईओवर. देश की राजधानी दिल्ली में राव तुला राम के नाम से कई सड़कें और इमारतें हैं. इन्हें देखते हुए अकसर लोगों के जेहन में सवाल आता होगा कि आख़िर ये हैं कौन. ऐसा होना भी लाज़मी है, क्योंकि देश के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले इस योद्धा के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं. आज इनकी बर्थ एनिवर्सरी है. इस ख़ास मौक़े पर हम इतिहास के पन्नों से उनसे जुड़ी सारी जानकारी लेकर आए हैं, जिसके बारे में जानकर आपको भी उन पर गर्व होगा.

Source: probashionline

9 दिसंबर 1825 को राव तुला राम का जन्म रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था. उस वक़्त रेवाड़ी, जिसे अहिरवाल का लंदन भी कहा जाता है, वहां उनके पिता राव पूर्ण सिंह का राजा था. उनकी रियासत आज के दक्षिण हरियाणा में फैली थी, जिसमें क़रीब 87 गांव थे.

14 साल की उम्र में संभाली थी राजगद्दी

Source: wikipedia

राव तुला राम जब 14 साल के थे तो उनके पिता का देहांत हो गया था. उसके बाद 14 साल की उम्र में ही उन्हें राज गद्दी संभालनी पड़ी थी. लेकिन पिता की मौत के बाद अंग्रेज़ों ने उनकी रियासत पर कब्ज़ा करना चाहा.

अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे उनकी आधी से अधिक रियासत पर कब्ज़ा कर लिया था. फिरंगियों की इस हरकत के बाद राव तुलाराम का ख़ून खौलना लाज़मी था. उन्होंने धीरे-धीरे अपनी एक सेना तैयार की. रेवाड़ी के लोगों ने भी इसमें योगदान दिया. उन्होंने अपनी 500 सैनिकों की एक सेना भी तैयार कर ली थी. 1857 के विद्रोह की आग जब मेरठ तक पहुंची तो वो भी इस क्रांती में कूद पड़े. इसमें उन्हें दिल्ली के बादशाह का भी साथ मिला.

Source: youtube

अंग्रेज़ों की नाक में कर दिया था दम राव तुलाराम और उनके भाई के नेतृत्व में रेवाड़ी की सेना ने अंग्रेज़ी हुक़ूमत की नाक में दम कर दिया और रेवाड़ी व उसके आस-पास के कई इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया. एक तरफ मेरठ में सैनिकों का कारतूस न इस्तेमाल करने का विवाद और दूसरी तरफ राव तुलाराम का बढ़ता कद. इन दोनों से ही अंग्रेज़ी हुक़ूमत तिलमिलाई हुई थी.

एक महिने तक अंग्रेज़ी सेना को उलझाए रखा था

Source: hinduwebsite

इसलिए उन्होंने राव तुला राम को ख़त्म करने के इरादे से अपनी सेना को भेजा. उन्होंने ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स को एक भारी सेना सहित रेवाड़ी की ओर रवाना किया. 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी में उनकी झड़प राव तुला राम की एक सैनिक टुकड़ी से हुई. उनके सैनिकों ने पूरे 1 महीनों तक अंग्रेज़ों को घेरे रखा और आगे बढ़ने नहीं दिया. फिर अंग्रेज़ों ने कर्नल ज़ैराल्ड को उनके साथ लड़ने के लिए भेजा. 16 नंवबंर 1857 में अंग्रेज़ी सेना और राव तुला राम की सेना के बीच नसीबपुर के मैदान में भीषण जंग हुई.

Source: youngisthan

राव तुला राम की सेना ने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी. उनकी सेना का पराक्रम देखकर ब्रिटिश सरकार भी दंग रह गई. इस युद्ध में कर्नल ज़ैराल्ड की मौत हो गई. इसके बाद अंग्रेज़ों ने चाल चलते हुए पास की रियायतों को अपनी ओर से राव तुलाराम के ख़िलाफ लड़ने के लिए राज़ी कर लिया. नारनौल में हुई लड़ाई में उनकी सेना के कई अहम योद्धा मारे गए. राव तुला राम अंग्रेज़ों को चकमा देकर तात्या टोपे की सेना में शामिल हो गए, लेकिन बदले की आग को उन्होंने कभी बुझने नहीं दिया.

देश को आज़ाद कराने के लिए विदेशी राजाओं से भी मांगी थी मदद

Rao Tula Ram
Source: postagestamps

फिर वहां से राव तुला राम ईरान के राजा की मदद लेने के लिए ईरान पहुंच गए. वहां से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे और वहां के राजा को भी भारतीय सेना की मदद करने के लिए तैयार कर लिया. मगर इसी बीच काबुल में वो किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो गए. 23 सितंबर 1863 को उन्होंने काबुल में अंतिम सांस ली. वहां पर उनका शाही सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था.

राव तुला राम ने भारत को आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. अपनी सेना खड़ी करने से लेकर भारतीय सेना को अंग्रेज़ों के खिलाफ़ मज़बूत बनाने के लिए विदेशों से भी मदद मांगने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस ज़ाबाज़ सेनानी को हमारा शत-शत नमन.

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