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क्या श्री कृष्ण अहीर थे? अहीर शब्द का विवेचन और भागवत धर्म

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आज ये प्रश्न बहुत अधिक लोग पूछ रहे हैं कि क्या श्री कृष्ण अहीर थे?

मुझे नहीं पता ये प्रश्न क्यों पूछे जा रहें हैं कि ” क्या श्री कृष्ण अहीर थे?” शायद इसका अर्थ ये निकाला जा रहा हो कि यादव और अहीर अलग होते हैं क्योंकी की मत्स्य पुराण में कुछ मलैक्षो को भी अहीर कहा गया है| इसके आधार पर कृष्ण को यादव कहकर अहीर से अलग कर दिया जाता है । परन्तु ये बातें सिर्फ और सिर्फ तुच्छ विचारों की उपज है|

अहीर का क्या अर्थ है?

सर्वप्रथम ये जानते हैं कि अहीर का अर्थ क्या होता है? अहीर शब्द संस्कृत के अभीर शब्द का तद्भव शब्द है | जिसका अर्थ होता है निडर , जो कि व्यक्ति के प्रवृति को दर्शाता है| पुराणों में इसके एक और अर्थ इस प्रकार हैं :” जिसके आने से चारों तरफ भय व्याप्त हो जाता वह आभीर् है”

अहीर जाति की उत्पत्ति

अहीर जाति की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे कोई अधिक प्रमाणित तथ्य मौजूद नहीं हैं परन्तु हम इस शब्द का शास्त्रीय और ऐतिहासिक विवेचन करेगें:

सर्वप्रथम यदुवंश की वंशावली देखते हैं जो कि अहीर जाति का होने की प्रबल दावेदारी करते हैं :

वंशावली क्रम पत्नी का नाम
1.अत्री अनुसुइया
2. सोम / साम तारा
3. बुद्धइला
4. पुरुरवाउर्वशी
5. आयु
6. नहुषविरज
7. ययाति / युयुत्सु / एबीर देवयानी और शर्मिष्ठा

राजा ययाति के 5 पुत्र हुए : प्रथम पत्नी देवयानी से यदु ( याहुदय्य ) व तुर्वशु ( तुरवजु ) और दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा से अनु , द्रुह्य और पुरू हुए |

और यदु के वंशजों को यादव, टूर्वशु के वंशजों को यवन , अनु के आनब , द्रुह्य के मलेक्श

और पुरू के वंशजों को पौरव कहा गया |

  • महाराजा ययाति को ईरानी ग्रन्थ अवेंस्ता में एवीर (avir) कहा गया है, जो अभीर शब्द का ही वाचक है दोनो का अर्थ भी समान ही है, इसके अलावा भारतीय पुराणों खासकर मत्स्य पुराण में राजा ययाति के लिए अभीर शब्द का प्रयोग विशेषण के रुप में बार बार किया गया है| जो किि राजा
  • ययाति अहीर / अभीर जाति से ही संबद्ध होने की पुष्टि करता है। इसके अलावा पुराणों मे ययाति के पूर्वज पुरुरवा के लिए भी बार बार अभीर शब्द का प्रयोग विशेषण के रुप में
  • किया गया है इन शब्दों का प्रयोग विशेषण के रुप इसलिए हुआ है क्योंकि अधिकतर पुराण 12 वीं शताब्दी में या उसके बाद लिखे गए हैं , जो सम्भवतः लंबे अंतराल के कारण अज्ञानता वश विशेषण के रूप में प्रयोग किए गए । परन्तु इनका सम्बन्ध अहीर / अभीर जाति से ही है । यहूदियों के पूर्वजों के रुप में यहूदअय के रूप में यदु का ही वर्णन है | hebrew हिब्रू जनजाति मूलतः संस्कृत भाषा के अभीरु शब्द का ही विकृत रूप है।
  • दत्तात्रेय से संबंधित अधिकतर ब्राह्मण अहीर जाति से सम्बद्ध होने का दावा करते हैं Gangaram Garg distinguishes a Brahmin community who use the Abhira name and are found in the present-day states of Maharashtra and Gujarat. wikipedia से.
  • प्रसिद्ध इतिहासकार श्री अग्रवाल ने अपनी पुस्तक विशाल भारत में यादवो के वर्णन करते हुए लिखे है के इस देश के सभ्यता, संस्कृति, धर्म और भाषा सब अहिरो की देन है कौरव पाण्डव सब अहीर थे |
  • मत्स्य पुराण में आनव, मलेक्ष और यवनों के बारे में भी अभीर शब्द प्रयोग किया गया है।

उपर्युक्त बिन्दुओं पर यदि ध्यान दे वास्तव में अहीर/अभीर जनजाति का सम्बंध मूलतः अत्री / अभ्रि से ही है| अत्री/ अभ्रि शब्द से ही अभीर जनजाति की उत्पत्ति हुई है । विदित हो कि अहीर वर्तमान की किसी भी जाति से सम्बद्ध हो परंतु उनका गोत्र अत्री ही है| वर्तमान मे अहीर ; यादव, नाग, गड़रिया, जाट , नाई, ब्राह्मण में मुख्यतया पाए जाते हैं। उन सभी का ऋषि गोत्र निश्चित ही अत्री होगा। परन्तु उनमें से अधिकतर लोग अपनी इस पहचान को खो दिए जैसे एक छोटे बच्चे को उसके पिता के नाम से ज्यादा पहचाना जाता है और उसके दादा नाम से कम।

परन्तु हो सकता है उनमें यादव सबसे अधिक शिक्षित रहें हों जिससे उन्होंने अपनी प्राचीन विरासत को संजोए रखने में अधिक सफल रहे| शायद इनका माध्यम संगीत रहा हो, क्योंकी गीता में श्री कृष्ण ने कहा है : मैं वेदों में सामवेद हूँ जो कि यादव को संगीत से संबद्ध होने की पुष्टि करता है। जो विरहा और आल्हा के रूप में अपने पूर्वजों की विरासत सहेजने की आज भी देखी जाती है।

यादव; यदुवंशी अहीर, कौरव पाण्डव; पौरव अहीर, जाट और गड़रिया मलेक्ष अहीर आदि हैं|

इसके लिए आप उपरोक्त बिन्दुओं को पुनः पढे : यादव अहीर है, अग्रवाल जी के अनुसार कौरव पांडव सब अहीर ( पौरव वंशी) थे | , दत्तात्रेय ब्राह्मण अहीर है, कुछ नाग भी अहीर होने का क्लेम करते हैं, जो नहुष के नागलोक में उपन्न हुए पुत्रों से सम्बन्ध रखते हैं| पुराणों में मलेक्ष , अनव, यवन आदि को भी अभीर कहा गया है, अवेंस्त में ययाति को एविर बोला गया है । ये सारी बाते एक ही तरफ इशारा करते हैं की सभी अत्री गोत्र के लोग अहीर जनजाति से सम्बंधित है | और सारे सोमवंशी अहीर ही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो अहीर जनजाति से संबद्ध लोगो को ही पुराणों मे अत्री गोत्र में रखा गया है |

Read Also : अहीर ( अभीर ) , यादव और गोप कौन है?

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या श्री कृष्ण अहीर थे?

कृष्ण का जन्म यदुकुल में वासुदेव जी के पुत्र के रूप में हुआ | अत्री गोत्र से संबंधित प्रत्येक व्यक्ति मूलतः अहीर है दूसरे शब्दों में प्रत्येक सोम वंशी अहीर है, इसी सोम वंश में यदु हुए तो यादव भी अहीर हैं, यादव अहीर है तो इसी यदुकुल में जन्म लेने के कारण कृष्ण भी अहीर थे।

प्रत्येक यादव अहीर होता है, परन्तु प्रत्येक अहीर यादव नहीं होता, वे अत्री गोत्र के अंतर्गत यवन, नाग , मलेक्ष , आनव, पौरव , दत्तात्रेय आदि के वंशज भी हो सकते हैं।

परन्तु कुछ ऐसे लोग यादव होने का दावा करते हैं जो स्वयं को अहीर न मानते है। और वो यादव कर्म मूलक सिद्धांत गोपवृति को भी स्वीकार नहीं करते हैं| इसका मूल कारण उनका तुच्छ विचार, पौराणिक दुराग्रह हो सकता है , क्योंकी यह दुराग्रह ब्राह्मणों की यादवों से पुराणों में भी ईर्ष्या वश दृष्टि गत होती है परन्तु हम यहां ऋग्वेद की भी बात करेंगे पहले पुराणों में विरोधाभास देखते हैं

गोपायनं य:  कुरुते जगत: सर्वलौककम् ।
स कथं गां गतो देशे विष्णु: गोपत्वम् आगत ।।९।  (हरिवंश पुराण ख्वाजा कुतुब वेद नगर बरेली संस्करण अनुवादक पं० श्री राम शर्मा आचार्य)
अर्थात् :- जो प्रभु विष्णु पृथ्वी के समस्त जीवों की रक्षा करने में समर्थ है ।
वही गोप (आभीर) के घर (अयन)में गोप बनकर आता है ।९। हरिवंश पुराण १९ वाँ अध्याय ।

तथा और भी देखें—यदु को गायों से सम्बद्ध होने के कारण ही यदुवंशी (यादवों) को गोप कहा गया है ।
देखें— महाभारत का खिल-भाग हरिवंश पुराण
__________________________________________
” इति अम्बुपतिना प्रोक्तो वरुणेन अहमच्युत ।
गावां कारणत्वज्ञ: सतेनांशेन जगतीं गत्वा गोपत्वं एष्यति ।।२२।।
द्या च सा सुरभिर्नाम् अदितिश्च सुरारिण: ते$प्यमे तस्य भुवि संस्यते ।।२४।।
वसुदेव: इति ख्यातो गोषुतिष्ठति भूतले ।
गुरु गोवर्धनो नामो मधुपुर: यास्त्व दूरत:।।२५।।
सतस्य कश्यपस्य अंशस्तेजसा कश्यपोपम:।
तत्रासौ गोषु निरत: कंसस्य कर दायक: तस्य भार्या द्वयं जातमदिति: सुरभिश्चते ।।२६।।
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्य धीमत:
_________________________________________
अर्थात्  हे विष्णु ! महात्मा वरुण के एैसे वचन सुनकर
तथा कश्यप के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके
उनके गो-अपहरण के अपराध के प्रभाव से
कश्यप को व्रज में गोप (आभीर) का जन्म धारण करने का शाप दे दिया ।।२६।।
कश्यप की सुरभि और अदिति नाम की पत्नीयाँ क्रमश:
रोहिणी और देवकी हुईं ।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री रामनायण दत्त शास्त्री पाण्डेय ‘ राम’  द्वारा अनुवादित हरिवंश पुराण में वसुदेव को गोप ही बताया है ।
इसमें यह 55 वाँ अध्याय है । पितामह वाक्य नाम- से पृष्ठ संख्या [ 274 ]
_________________________________________
षड्यन्त्र पूर्वक पुराणों में  कृष्ण को गोपों से पृथक दर्शाने के लिए कुछ प्रक्षिप्त श्लोक समायोजित किये गये हैं । जैसे भागवतपुराण दशम् स्कन्ध के आठवें अध्याय में
यदूनामहमाचार्य: ख्यातश्च भुवि सर्वत: ।
सुतं मया मन्यते देवकी सुतम् ।।७।
अर्थात् गर्गाचार्य जी कहते हैं कि नन्द जी मैं सब जगह यादवों के आचार्य रूप में प्रसिद्ध हूँ ।
यदि मैं तुम्हारे पुत्र का संस्कार करुँगा । तो लोग समझेगे यह तो वसुदेव का पुत्र है ।७।
एक श्लोक और
” अयं हि रोहिणी पुत्रो रमयन् सुहृदो गुणै: ।
आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदु:।
यदूनाम् अपृथग्भावात् संकर्षणम् उशन्ति उत ।।१२
अर्थात् गर्गाचार्य जी ने कहा :-यह रोहिणी का पुत्र है ।इस लिए इसका नाम रौहिणेय ।
यह अपने लगे सम्बन्धियों  और मित्रों को  अपने गुणों से आनन्दित करेगा इस लिए इसका नाम राम होगा।इसके बल की कोई सीमा नहीं अत: इसका एक नाम बल भी है ।
यह यादवों और गोपों में कोई भेद भाव नहीं करेगा इस लिए इसका नाम संकर्षणम् भी है ।१२।
परन्तु भागवतपुराण में ही परस्पर विरोधाभास है ।
देखें—
” गोपान् गोकुलरक्षां निरूप्य मथुरां गत ।
नन्द: कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरुद्वह।।१९।
वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नन्दमागतम्।
ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम् ।२०।
अर्थात् कुछ समय के लिए गोकुल की रक्षा का भाव नन्द जी दूसरे गोपों को सौंपकर कंस का वार्षिक कर चुकाने के लिए मथुरा चले गये ।१९। जब वसुदेव को यह मालुम हुआ कि मेरे भाई नन्द मथुरा में आये हैं ।जानकर कि भाई कंस का कर दे चुके हैं ; तब वे नन्द ठहरे हुए थे बहाँ गये ।२०।
और ऊपर हम बता चुके हैं कि वसुदेव स्वयं गोप थे ,
तथा कृष्ण का जन्म गोप के घर में हुआ।
फिर यह कहना पागलपन है कि कृष्ण यादव थे नन्द गोप थे । भागवतपुराण बारहवीं सदी की रचना है ।

क्या श्री कृष्ण अहीर थे? ऋग्वेद में यादवों का वर्णन गोप / अहीर के रूप में

क्या श्री कृष्ण अहीर थे?

यदु की गोप वृत्ति को प्रमाणित करने के लिए ऋग्वेद की ये ऋचा सम्यक् रूप से प्रमाण है । ” उत् दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा यदुस्तुर्वश्च च मामहे ।(ऋ०10/62/10) अर्थात् यदु और तुर्वसु नामक दौनों दास गायों से घिरे हुए हैं ; गो-पालन शक्ति के द्वारा सौभाग्य शाली हैं हम उनका वर्णन करते हैं । (ऋ०10/62/10/)

अहीर/ अभीर शब्द का उल्लेख

अभीर शब्द का उल्लेख पाणिनि के अष्टाध्यायी , पतंजलि के महाभाषय और संस्कृत साहित्य इतिहास में भी मिलता है , जिनमें से पाणिनि के अष्टाध्यायी , पतंजलि के महाभाषय अधिक प्राचीन हैं जो कि अहीर जाति की प्राचीनता को दर्शाती है।

क्या श्री कृष्ण अहीर थे? यादव का क्षत्रिय रूप में वर्णन सत्य या षड्यंत्र

यादवों को पुराणों में षड्यंत्र पूर्वक क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में वर्णन मिलता है, परन्तु ये सारे वर्णन 12 वीं शताब्दी में लिखे गए पुराणों में एक षड्यंत्र का हिस्सा है| क्षत्रिय ब्राह्मणों की नाजायज संताने है अधिक जानकारी के लिए महाभारत और स्मृति ग्रंथ पढ़े। यादव ना क्षत्रिय थे, ना वैश्य, ना ही शुद्र । यादव पारम्परिक रूप से भागवत धर्म को मानने वाले थे जिसमें वर्ण व्यवस्था थीं ही नहीं| फिर क्षत्रिय, वैश्य , शूद्र होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

अहीरों का मूल धर्म भागवत धर्म और धार्मिक ग्रन्थ गीता

भागवत धर्म गुप्त काल में अपने चरम सीमा पर रहा । यही अहीर जनजाति का मूल धर्म था जिसे शाश्वत धर्म के नाम से भी जाना जाता था जिसका वर्णन, गुप्त शिलालेख, बौद्ध और जैन धर्म ग्रंथो में प्रतिद्वंदी धर्म के रूप में प्राप्त होता है। वेदों, स्मृति ग्रंथों और पुराणों में भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण और अहिरो के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग, कृष्ण का व्यभिचारी रूप में वर्णन, तीसरी शताब्दी में ब्राह्मणों के द्वारा अहिरो को आतंकवादी घोषित करना, 4 थीं शताब्दी में लिखे गए वाल्मिकी रामायण में समुद्र कहने पर राम द्वारा अहीर जाति का काल्पनिक नाश कराना, इंंंद्रर – कृष्ण युद्ध , फिर परशुराम जी द्वारा अहीर जाति के पूर्वज सम्राट सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनके वंशजों का किताबी नाश करना ये सारे बाते भागवत धर्म के प्रति ईर्ष्या का ही मूलक है।

भागवत धर्म के दर्शनों को 5 वीं शताब्दी में संग्रहीत करके कुछ ब्राह्मणिक प्रक्षिप्ति डालकर श्री मद्भागवत गीता लिखी गयी। परन्तु प्रक्षिप्तियों के बाद भी गीता आज हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। परन्तु लोग ये नहीं जानते कि ये दर्शन कभी हिंदू धर्म के प्रतिद्वंदी हुआ करते थे। जिसका हिंदू धर्म से दूर दूर तक कोई नाता नहीं था।

भागवत धर्म को षड्यंत्र पूर्वक वैष्णव धर्म बना दिया गया फिर वैष्णव सम्प्रदाय बना दिया गया फिर जगतगुरु शंकराचार्य जी के समय आते आते ये पूर्ण रूप से हिन्दू धर्म में विलीन हो गया।

अहीर जनजाति के पूर्वजों द्वारा किए जाने वाले पारम्परिक कार्य और परंपराएं ही भगवान कृष्ण के प्रभाव से 15 वीं शताब्दी ईसा पूर्व भागवत धर्म के दर्शनों के रूप में प्रतिबिम्बित हुए। इसमें

आज भी यदुवंशी अहीर ; वर्ण व्यवस्था की किसी भी शाखा में सही नहीं बैठते! क्योंकि वे वर्ण व्यवस्था से बाहर थे। उनके पूर्वज भागवत धर्म का पालन करते थे। जो गुप्त काल के समाप्ति के बाद अपना वर्चस्व लगातार खोता गया अंत में हिंदू धर्म में विलीन हो गया।

आज भी बहुत सारे ब्राह्मण और ब्राह्मण संस्थाएं यादवों को हिन्दू नहीं मानते क्योंकि वे इस तथ्य को जानते हैं, बहुत सारे बाबा कृष्ण व्यभिचारी रूप में जानबूझ का वर्णन करते रहते हैं।

वर्तमान के यादव सिर्फ केवल एक जाति नहीं है वह भागवत धर्म का जीवन्त रूप है, अब यदि वे भागवत धर्म को पुनः प्रतिष्ठित नहीं कर सकते तो कम कम उन्हे यादव धर्म का पालन करना चाहिए।

अहीर शब्द पर्याय वाची शब्द वर्तमान आंकलन

यदि अहीर या अभीर शब्द का अध्ययन किया जाय तो यह गुजराती के आयर, दक्षिण भारत इय्यर , आर्य, आसुर , अविर, वीर, ईरानी अहुर आदि शब्दों के समान ही उच्चारण रखते हैं आश्चर्य की बात ये है कि इनके अर्थ एक ही है श्रेष्ठ और शक्तिशाली। कुछ लोग असुर शब्द को देखकर चौंक गए होंगे। तो आप चिंतित मत होइए असुर और आर्य दोनो एक ही थे दोनों का अर्थ भी समान, भगवान राम को भी ऋग्वेद में असुर बोला गया है, कृष्ण को भी, बहुत सारे यादव और राजाओं को भी असुर बोला गया है जैसे बाण, लवण, मधु, आदि । भगवान कृष्ण और असुर राजा बलि एक दूसरे के समधी थे, वहीं प्रदुम्न और बाण एक दूसरे के समधी थे। असुर का अर्थ श्रेष्ठ और शक्तिशाली ही होता है। परन्तु कालांतर मे ईर्ष्या वश ये पुराणों मे नकारात्मक अर्थो में रूढ़ हो गया। ऋगवेद में कुल लगभग 105 बार असुर शब्द का प्रयोग है जिनमें से 90 बार साकारात्मक दृष्टिकोण से और 15 बार नकारात्मक दृष्टिकोण ( ईर्ष्या वश) से किया गया है।

परन्तु आज कल के कुल मूर्ख लोग और इतिहासकार देव संस्कृति ( सुर संस्कृति) के लोगो को आर्य बताने में तुले हुए हैं।

यह भी पढ़े : स्वर्ग और इन्द्र का रहस्

अहीर जाति के लोगों भारतीय संस्कृति पर बहुत प्रभाव पड़ा है, पाखंड का विरोध, प्रकृति की पूजा, सभी जाति और धर्म के लोगो को समभाव कि दृष्टि से देखना, गोपालन , कृषि, ग्राम का विकास ( ग्राम का अर्थ है ग्रास/घास से घिरा क्षेत्र: जो अहीर से ही संबंधित है), आदि | अहीर जाति के लोगों का राज्य अपने समय मे चमत्कारिक रहा है : नेपाल का गोपाल राजवंश ( एक तरह से नेपाल का स्वर्ण युग था) , गुप्त काल भारत स्वर्ण युग रहा , यादव साम्राज्य विजयनगर मध्यकालीन भारत का सबसे गौरवशाली राज्य

नोट : बोध संहिता के अनुसार गुप्त एक पाली भाषा का शब्द जिसका संस्कृत अर्थ गोप ( यादव/ अहीर ) होता है गुप्त वंश के संस्थापक श्रीगुप्त नेपाल के गोपाल राजवंश के वंशज थे। इसके अलावा श्री गुप्त के सम्बंध में और कोई लेख प्राप्त नहीं होते, गुप्त राजाओं स्वयं को परम भगवतेय कहते थे और भागवत धर्म को मानते थे।

वर्तमान में गुप्त शब्द का उपयोग उपनाम के रूप में वणिक लोग करते हैं जो संस्कृत के गुप्तन शब्द से बना है जिसका अर्थ है छिपाना, वणिक व्यापार के बाद अपने पैसों को छिपाकर रखते थे ताकि कोई चोर उन्हें लूट ने ले। इसी से यह प्रचलन में आया। इसका पाली भाषा के गुप्त शब्द से कोई सम्बंध नहीं है।

आभीर पुल्लिंग विशेषण संज्ञा गोपालः समानार्थक: 

१-गोपाल,२-गोसङ्ख्य, ३-गोधुक्, ४-आभीर,५-वल्लव,६-गोविन्द, ७-गोप ८ – गौश्चर: 

(2।9।57।2।5)

अमरकोशः)

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1 Comment
  1. Mutiei says

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