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पहली बार देखिए स्वर्ग की 10 तस्वीरें ! सत्य बनाम कल्पना

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स्वर्ग क्या है

केवल सुर जन-जाति का अस्तित्व जर्मनिक जन-जातियाें की पूर्व शाखा के रूप में नॉर्स कथाओं में वर्णित हैं ।यह भारतीय संस्कृति की दृढ़ मान्यता है ,सुर { स्वर } जिस स्थान { रज} पर पर रहते थे उसे ही स्वर्ग कहा गया है —“स्वरा: सुरा:वा राजन्ते यस्मिन् देशे तद् स्वर्गम् कथ्यते “….जहाँ छःमहीने का दिन और छःमहीने की रातें होती हैं वास्तव में आधुनिक समय में यह स्थान स्वीडन { Sweden} है जो उत्तरी ध्रुव पर हैमर पाष्ट के समीप है प्राचीन नॉर्स भाषाओं में स्वीडन को ही स्वरगे { Svirge } कहा है ..

🌓⛅🌓⛅🌑🌚🌝.भारतीय आर्यों को इतना स्मरण था कि उनके पूर्वज सुर { देव} उत्तरी ध्रुव के समीप स्वेरिगी में रहते थे इस तथ्य के भारतीय सन्दर्भ भी विद्यमान् हैं बुद्ध के परवर्ती काल खण्ड में लिपि बद्ध ग्रन्थ मनु स्मृति में वर्णित है ।अहो रात्रे विभजते सूर्यो मानुष देैविके !! देवे रात्र्यहनी वर्ष प्र वि भागस्तयोःपुनः || अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्यात् दक्षिणायनं —— मनु स्मृति १/६७ …अर्थात् देवों और मनुष्यों के दिन रात का विभाग सूर्य करता है मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का एक दिन रात होता है अर्थात् छः मास का दिन .जब सूर्य उत्तारायण होता है !🌓⚡🌓⚡🌓⚡🌓⚡🌓⚡और छःमास की ही रात्रि होती है जब सूर्य दक्षिणायनहोता है ! प्रकृति का यह दृश्य केवल ध्रुव देशों में ही होता है !

वेदों का उद्धरण भी है …….📖📝…”अस्माकं वीरा: उत्तरे भवन्ति ” हमारे वीर { आर्य } उत्तर में हुए ..इतना ही नहीं भारतीय पुराणों मे वर्णन है कि …कि स्वर्ग उत्तर दिशा में है !! वेदों में भी इस प्रकार के अनेक संकेत हैं …..मा नो दीर्घा अभिनशन् तमिस्राः ऋग्वेद २/२७/१४ वैदिक काल के ऋषि उत्तरीय ध्रुव से निम्मनतर प्रदेश बाल्टिक सागर के तटों पर अधिवास कर रहे थे , उस समय का यह वर्णन है ……कि लम्बी रातें हम्हें अभिभूत न करें ….वैदिक पुरोहित भय भीत रहते थे, कि प्रातः काल होगा भी अथवा नहीं , क्यों कि रात्रियाँ छः मास तक लम्बी रहती थीं 🌓⚡🌓⚡.

.रात्रि र्वै चित्र वसुख्युष्ट़इ्यै वा एतस्यै पुरा ब्राह्मणा अभैषुः – तैत्तीरीय संहित्ता १ ,५, ७, ५ अर्थात् चित्र वसु रात्रि है अतः ब्राह्मण भयभीत है कि सुबह ( व्युष्टि ) न होगी !!! आशंका है . ……. ध्यातव्य है कि ध्रुव बिन्दुओं पर ही दिन रात क्रमशःछः छः महीने के होते है | परन्तु उत्तरीय ध्रुव से नीचे क्रमशः चलने पर भू – मध्य रेखा पर्यन्त स्थान भेद से दिन रात की अवधि में भी भेद हो जाता है . और यह अन्तर चौबीस घण्टे से लेकर छः छः महीने का हो जाता है | …… अग्नि और सूर्य की महिमा आर्यों को उत्तरीय ध्रुव के शीत प्रदेशों में ही हो गयी थी !!!!! . .अतः अग्नि – अनुष्ठान वैदिक सांस्कृतिक परम्पराओं का अनिवार्यतः अंग था .जो परम्पराओं के रूप में यज्ञ के रूप में रूढ़ हो गया … ……. ………अग्निम् ईडे पुरोहितम् यज्ञस्य देवम् ऋतुज्यं होतारं रत्नधातव …ऋग्वेद १/१/१ …….. अग्नि के लिए २००सूक्त हैं । अग्नि और वस्त्र आर्यों की अनिवार्य आवश्यकताएें थी | वास्तव में तीन लोकों का तात्पर्य पृथ्वी के तीन रूपों से ही था |

उत्तरीय ध्रुव उच्चत्तम स्थान होने से स्वर्ग है ! जैसा कि जर्मन आर्यों की मान्यता थी …..उन्होंने स्वेरिकी या स्वेरिगी को अपने पूर्वजों का प्रस्थान बिन्दु माना यह स्थान आधुनिक स्वीडन { Sweden} ही था | प्राचीन नॉर्स भाषाओं में स्वीडन का ही प्राचीन नाम स्वेरिगे { Sverige } है ! यह स्वेरिगे Sverige .} देव संस्कृति का आदिम स्थल था, वास्तव में स्वेरिगे Sverige ..शब्द के नाम करण का कारण भी उत्तर पश्चिम जर्मनी आर्यों की स्वीअर { Sviar } नामकी जन जाति थी .अतः स्वेरिगे शब्द की व्युत्पत्ति भी सटीक है। स्वर्ग

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते हैं और अग्नि इसे जला नहीं सकती है | जल इसे गीला नहीं कर सकता है और वायु इसे सुखा नहीं सकती है ।।

तो सोचने वाली बात यह है कि स्वर्ग में सुख और अप्सराएं किसलिए? नरक में दुख कौन सहेगा ? सोचना जरूर🤔🤔

स्वर्ग के बारे में अधिक पढ़ने के लिए जरूर पढे 🙏 : स्वर्ग कहा है? Where is Heaven ( Swarg)?

पहली बार देखिए स्वर्ग की 10 तस्वीरें और जानिए मृत्यु के बाद आपको कैसा दिखेगा स्वर्ग ! youngistan.in पर लिखे आर्टिकल का विवेचन

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  • मृत्यु के बाद की कल्पना – कहा जाता है कि जीते जी इंसान जैसा कर्म करता है उसी के हिसाब से मरने के बाद उसकी आत्मा को स्वर्ग या नर्क में स्थान मिलता है. स्वर्ग और नर्क दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, हालांकि कोई भी इंसान ये नहीं चाहेगा कि मरने के बाद उसे नर्क की यातनाएं झेलनी पड़े लिहाजा हर इंसान मरने के बाद स्वर्ग लोक जाने की ही कामना करता है.

चूतियां बनाया जाता है बस, नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते हैं और अग्नि इसे जला नहीं सकती है | जल इसे गीला नहीं कर सकता है और वायु इसे सुखा नहीं सकती है ।। तो सोचने वाली बात यह है कि स्वर्ग में सुख और अप्सराएं किसलिए? नरक में दुख कौन सहेगा ? सोचना जरूर🤔🤔 अधिक जानने के लिए स्वर्ग कहा है जरूर पढे। नरक की भी विवेचना इस आर्टिकल मे की गयी है।

तो चलिए आज हम पहली बार आपके लिए लेकर आए हैं स्वर्ग की 10 तस्वीरें, इन तस्वीरों को देखकर आप कल्पना कर सकते हैं कि मृत्यु के बाद की कल्पना आपकी आत्मा को स्वर्ग कैसा दिखनेवाला है.

मृत्यु के बाद की कल्पना –

1 – इस तस्वीर में देखिए स्वर्ग की ओर जानेवाली फूलों से सजी हुई इन सीढ़ियों को, मौत के बाद देवदूत आत्मा को इन्हीं सीढ़ियों के रास्ते स्वर्ग लोक ले जाते हैं.

सुर जाति के लोग ( ब्राह्मण) भारतीय आर्यो से ख़ुद को श्रेष्ठ बताने की चेष्टा कर कर रहें हैं कि हमारा देश ऊपर ( उत्तर में ) है |

जो कि काल्पनिक ही है भारतीय पुराणों मे उत्तर का अर्थ उपर ही होता है

2- देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल में हिमालय के बंदरपूंछ में स्थित स्वर्गारोहिणी चोटी से ही स्वर्ग का रास्ता जाता है.

स्वर्ग स्वीडन ही है उत्तर दिशा में पड़ता ये रास्ता भी उत्तर की तरफ जाता है भाई योगेश कुमार रोही जी अनुसार सुर जाति के लोगो का भारत में प्रवेश प्रवेश तिब्बत के रास्ते से हुआ था। इरान के रास्ते से नहीं।

3 – स्वर्ग लोग में रहनेवाले देवदूत और वहां के निवासी पृथ्वीलोक से बिल्कुल अलग होते हैं, इन काल्पनिक तस्वीरों को देखकर आप स्वर्ग की खूबसूरती का अंदाजा लगा सकते हैं.

हा स्वर्ग (स्वीडन ), ध्रुवीय प्रदेश या यूरोप में रहने वाले लोग हम लोगो से बिल्कुल अलग होते ज्यादा खूबसूरत होते है वहां की लड़कियां भी खूबसूरत होती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसा अप्सराओं का वर्णन है अप्सराएं भी अंग्रेज़ो की तरह कम वस्त्र ही पहनती थी। जो भारतीय महिलाओं को अपेक्षा अधिक सुंदर होती है

4 – स्वर्ग लोक में उड़नेवाले सफेद अश्व काफी मनमोहक दिखाई देते हैं और देवलोक की अप्सराएं परियों जैसी सुंदर नजर आती हैं. कुल मिलाकर स्वर्ग एक हसीन सपनों की नगरी जान पड़ती है.

ध्रुवीय प्रदेशो मे ज्यादा तर सफेग रंग के है जीव जन्तु पाए जाते हैं । स्वीडिश लड़कियां भी गोरी होती है। भारतीयों को अपेक्षा!

5 – घने बादलों के बीच बनी स्वर्ग लोक की इन्ही सीढ़ियों से चढ़कर पवित्र आत्माएं पृथ्वी से स्वर्ग लोक तक का सफर तय करती हैं.

पवित्र आत्मा का अर्थ ब्राह्मणों की पाखंडी ढकोसला है जो इनके पाखण्ड को मानेगा वही इनके देश जाएगा। स्वीडन के कई होटल का view आप बिल्कुल ऐसे ही देख सकते हैं

स्वीडनके ice hotel बिल्कुल वैसे ही जैसा की इन्द्र लोक की कल्पना है

और भी देखें : 11 Best Things To Do In The ICEHOTEL in Sweden https://handluggageonly.co.uk/2015/08/18/where-can-you-stay-at-a-unique-hotel-made-of-ice-and-why-you-really-should/

6 – स्वर्ग लोक से हर नजारा काफी अद्भुत और अलग नजर आता है. ऐसा लगता है जैसे यहां से आत्माएं सौर मंडल में स्थित सभी ग्रहों का दीदार करीब से कर पाती हैं.

हा यूरोपीय देशों / ध्रुवीय प्रदेशो से ग्रहों को देखना आसान है उन देशों की अपेक्षा जो भूमध्य रेखा के करीब है

7 – स्वर्ग लोग का जब भी जिक्र होता है तो देवराज इंद्र और उनकी अप्सराओं के चित्र मन में उभर आते हैं. देखिए स्वर्ग लोक के इस काल्पनिक चित्र को, जिसमें अप्सरा नृत्य करके सभा में मौजूद सभी देवों को मनोरंजन कर रही है.

ध्यान देने वाली बात है कि इंद्र लोक के आस पास को पेड़ पौधे नहीं दिखाई देते ध्रुवीय प्रदेशो मे बिल्कुल ऐसा ही होता है । आप फोटोशॉप करो ध्रुवीय प्रदेशो मे सिंहासन आदि लगाने के बाद देखो बिल्कुल ऐसा ही दिखेगा । अप्सराएं खुले स्वभाव की और सुंदर होती हैं बिल्कुल यूरोपीय लड़कियों को तरह

8 – उत्तराखंड के स्वर्गारोहिणी को महाभारत काल से ही स्वर्ग जाने के रास्ते के रुप में मान्यता प्राप्त है. इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि आखिर में पांडव भी जीवित इसी रास्ते से स्वर्ग गए थे.

महाभारत १२ वीं शताब्दी की रचना है और वो सत्य से बहुत दूर हों सकते हैं, हां एक बात है की कोई अन्य देश का निवासी ध्रुवीय प्रदेशो मे आसानी से जीवित नहीं रह सकता है। क्योंकि वहां बहुत ठंड होती है

9 – हालांकि भारत के आखिरी गांव से स्वर्ग की ओर जानेवाले रास्ते से पांडवों के बाद किसी भी इंसान के जीवित स्वर्ग जाने का जिक्र नहीं मिलता है. लेकिन आज स्वर्गारोहिणी विश्व विख्यात पर्यटन स्थल बन चुका है.

यह केवल पर्यटन को बढ़ावा देने का जरिया है, जैसे कि लंका में रावण से संबंधित कोई भी चीजे प्राप्त नहीं होती ना ही राम के वहां जाने की , फ़िर भी श्रीलंकन सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय पौराणिक कथाओं को प्रतिष्ठित कर रहीं हैं।

10 – कहा जाता है कि पुण्य आत्माओं को मौत के बाद यमराज लेने नहीं आते हैं बल्कि देवदूत उन्हें अपने साथ स्वर्ग लोक ले जाने के लिए आते हैं.

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्वाति नरोऽपराणि।तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य-न्यानि संयाति नवानि देही।। तो यमराज क्या खाक लेने जाते हैं?

ये है मृत्यु के बाद की कल्पना  – गौरतलब है कि ये सारी तस्वीरें मानव मस्तिष्क में स्वर्ग लोक को लेकर की जानेवाली कल्पनाओं की देन हैं या फिर शास्त्रों में स्वर्ग को लेकर जिस तरह की धारणाएं है उसके मुताबिक स्वर्ग लोक कुछ ऐसा ही दिखता होगा. इन तस्वीरों से आप ये कल्पना कर सकते हैं कि अगर मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग में स्थान मिला तो फिर आपका स्वर्ग कैसा होगा.

सारी चीजें

काल्पनिक हैं मरने के बाद ना कोई स्वर्ग जाता है ना नर्क ये संसार भौतिक नियमों से चलता है अधिक जानकारी के लिए उद्घव गीता पढ़ें ।

उद्धव जी द्वारा कड़वे प्रशन 💥 उद्धव गीता – संवाद भगवान श्री कृष्ण जी और उद्धव जी – UDDHAVA GITA

उद्धव जी द्वारा कड़वे प्रशन 💥 उद्धव गीता – संवाद भगवान श्री कृष्ण जी और उद्धव जी – UDDHAVA GITA

Note: आज कल अधिकतर लोग सुर संस्कृति के लोग जो ध्रुवीय प्रदेश/ यूरोपीय प्रदेशो ( ब्राह्मण) से आए थे उन्हे इतिहासकार और लोग आर्य बनाने में लगे हुए हैं। आर्य, असुर, वीर, अहुर, अभीर , इय्यर , आयर आदि शब्द एक दूसरे के पर्याय वाची है जिनका अर्थ श्रेष्ठ और शक्तिशाली होता है। असुर और आर्य एक ही थे । यहां तक कि ऋगवेद में भगवान् राम, कृष्ण, कृष्ण और अहिरो के आदि पूर्वज यदु , यवनो के पुर्वज तुरवसु , इंद्र, अग्नि आदि को असुर कहा गया है। पुराणों में कृष्ण के पुर्वज मधु, कृष्ण के समधी राजा बली, प्रदुम्न के समधी बाण आदि को भी असुर कहा गया है

बिना स्वर्ग कहा है? Where is Heaven ( Swarg)? आर्टिकल को पढे आपको ये समझ नहीं आएगा

1 Comment
  1. Fbdolm says

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