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पृथ्वीराज चौहान

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पृथ्वीराज चौहान कौन थे? राजपूत या गुर्जर पढ़ने के लिए क्लिक करें

पृथ्वीराज चौहान कौन थे? पृथ्वीराज चौहान -III

पृथ्वीराज तृतीय (शासनकाल: 1178–1192) जिन्हें आम तौर पर पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है, चौहान वंश ( चाऊ हूण जाति) के राजा थे। उन्होंने वर्तमान उत्तर-पश्चिमी भारत में पारम्परिक चौहान क्षेत्र सपादलक्ष पर शासन किया। उन्होंने वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से पर भी नियन्त्रण किया। उनकी राजधानी अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) में स्थित थी, हालाँकि मध्ययुगीन लोक किंवदन्तियों ने उन्हें भारत के राजनीतिक केंद्र दिल्ली के राजा के रूप में वर्णित किया है जो उन्हें पूर्व-इस्लामी भारतीय शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित करते हैं।

परन्तु पृथ्वीराज चौहान जी सच्ची और एतिहासिक विश्लेषण पढे

पृथ्वीराज चौहान की बेटी

बेला शूरवीर पृथ्वीराज चौहान की बेटी थी और कल्याणी जयचंद की पौत्री थी। पृथ्वीराज चौहान जहां देशभक्त और राष्ट्र प्रेमी थे, वही जयचंद एक गद्दार था। लेकिन जयचंद की पौत्री कल्याणी राष्ट्रभक्त थी, और पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला की सखी थी। ये बात उन दिनों की है जब मुहम्मद गौरी भारत को लुट रहा था। हमारे देश के खजाने को लूट कर वह अपने वतन ले जा रहा था। उस समय मुहम्मद गौरी की नजर बेला और कल्याणी पर पड़ी, तो वह उन दोनों को जबरदस्ती अपने साथ अपने वतन ले गया। पृथ्वीराज चौहान की बेटी की शादी ….

Comment : इतना सब होने के बाद भी अधिकतर राजपूत जयचंद को गद्दार नहीं मानते आखिर क्यों?

पृथ्वीराज चौहान की पत्नी

संयोगिता चौहान, जयचन्दअंग्रेज़ी: Sanyogita Chauhan) पृथ्वीराजतृतीय की पत्नी थी। राजपुत सम्राट पृथ्वीराज के साथ गान्धर्वविवाह कर के वें पृथ्वीराज की अर्धांगिनी बनी थी। भारत के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में संयोगिताहरण गिना जाता है।

क्या हुआ पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी संयोगिता के साथ?

पृथ्वीराज चौहान का नाम इतिहास में दर्ज है। भारत के कौशल योद्धाओं में तोर पर आज भी इनका नाम गर्व से लिया जाता है। जितने अद्भुत पृथ्वीराज चौहान की कहनी है उतनी ही रोचक उनकी प्रेम कहानी भी थी। पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता, दोनों एक समारोह में मिले थे और संयोगिता ने पृथ्वीराज चौहान को देखते हुए उन्हें अपना दिल दे दिया था। संयोगिता तय कर चुकी थीं कि शादी तो पृथ्वीराज चौहान से ही करेंगी।

संयोगिता के स्वयंवर में विभिन्न राज्यों के राजकुमारों और महाराजाओं को आमंत्रित किया गया लेकिन पृथ्वीराज को आमंत्रण नहीं भेजा गया था। पिता के इस व्यवहार से संयोगिता को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने स्वयंवर में मौजूद एक मूर्ति को पृथ्वीराज मानकर वरमाला डालने का फैसला कर लिया था। पृथ्वीराज को जब यह बात पता चली तो उन्होंने संयोगिता को स्वयंवर से भगाकर ले जाने का निर्णय लिया और कामयाब भी रहे, लेकिन इस कारण जयचंद उनके दुश्मन बन बैठे।

क्या आप जानते है पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी संयोगिता का क्या हुआ ?पृथ्वीराज की पत्नी संयोगिता ने चौहान की मृत्यु के बाद यह फैसला किया वो लाल किले में जौहर करेगी लेकिन मोहम्मद गोरी का सेनापति कुतुबुद्दीन संयोगिता सहित हजारों हिंदू महिलाओं को अपने शरण में रखना चाहता था इसीलिए पृथ्वीराज चौहान की मौत के बाद किले के बाहर उसमे अपना बसेरा दाल लिया।

कुतुबुद्दीन के ऐसा करने का भी कोई फायदा न हुआ। महारानी संयोगिता, रानी प्रथा और हजारों हिंदू वीरांगनाओं ने अपने-अपने पतियों के लिए जौहर कर दिया। कुतुबुद्दीन जब किले के अंदर पहुंचा तो उसे ठंडी चिताओं की राख मिली। कुतुबुद्दीन वीर महिलाओं के बलिदान को देख हक्का -बक्का रह गया। यह विराग महिलाओं की कहानी है।

पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता की मृत्यु कैसे हुई?

अलग अलग इतिहास कारो के अलग अलग मत है,

कुछ के अनुसार उन को शाहबुद्दीन मोहम्मद गौरी के सैनिकों ने अजमेर में पकड़ लिया था, लड़ाई के बाद, उन को ओर उन कि बेटियों की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बाहर कतल कर दिया गया था

ओर कुछ के मुताबिक, देल्ही के लाल कोट, जिसे आज लाल क़िला कहते है, उस के उपर मुस्लिम सैनिकों कि कार्यवाही के दौरान लड़ते हुए मृत्यु हुई

पृथ्वीराज चौहान की कितनी पत्नी थी?

पृथ्वीराज चौहान की 13 पत्नियां थी । पृथ्वीराज की तेरह रानियों में से संयोगिता अति रूपवती थी। संयोगिता को तिलोत्तमा, कान्तिमती, संजुक्ता इत्यादि नामों से भी जाना जाते थे। उनके पिता कन्नौज के राजा जयचन्द गहड़वाल(राठोड़) थे।

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई

तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान जी मृत्यु हुई थी।

पृथ्वीराज चौहान कहानी इतिहास जीवन परिचय| Prithviraj Chauhan history in hindi

पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास मे एक बहुत ही अविस्मरणीय नाम है. चौहान वंश मे जन्मे पृथ्वीराज आखिरी हिन्दू शासक भी थे. महज 11 वर्ष की उम्र मे, उन्होने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला और उसे कई सीमाओ तक फैलाया भी था, परंतु अंत मे वे राजनीति का शिकार हुये और अपनी रियासत हार बैठे, परंतु उनकी हार के बाद कोई हिन्दू शासक उनकी कमी पूरी नहीं कर पाया . पृथ्वीराज को राय पिथोरा भी कहा जाता था . पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही एक कुशल योध्दा थे, उन्होने युध्द के अनेक गुण सीखे थे. उन्होने अपने बाल्य काल से ही शब्ध्भेदी बाण विद्या का अभ्यास किया था.

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास कहानी जीवन परिचय

पृथ्वीराज चौहान का जन्म :

धरती के महान शासक पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 मे हुआ. पृथ्वीराज अजमेर के महाराज सोमेश्र्वर और कपूरी देवी की संतान थे. पृथ्वीराज का जन्म उनके माता पिता के विवाह के 12 वर्षो के पश्चात हुआ. यह राज्य मे खलबली का कारण बन गया और राज्य मे उनकी मृत्यु को लेकर जन्म समय से ही षड्यंत्र रचे जाने लगे, परंतु वे बचते चले गए.  परंतु मात्र 11 वर्ष की आयु मे पृथ्वीराज के सिर से पिता का साया उठ गया था, उसके बाद भी उन्होने अपने दायित्व अच्छी तरह से निभाए और लगातार अन्य राजाओ को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार करते गए.

पृथ्वीराज के बचपन के मित्र चंदबरदाई उनके लिए किसी भाई से कम नहीं थे. चंदबरदाई तोमर वंश के शासक अनंगपाल की बेटी के पुत्र थे . चंदबरदाई बाद मे दिल्ली के शासक हुये और उन्होने पृथ्वीराज चौहान के सहयोग से पिथोरगढ़ का निर्माण किया, जो आज भी दिल्ली मे पुराने किले नाम से विद्यमान है.

Prithvi Raj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान और उनका दिल्ली पर उत्तराधिकार :

अजमेर की महारानी कपुरीदेवी अपने पिता अंगपाल की एक लौती संतान थी. इसलिए उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी, कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका शासन कौन संभालेगा. उन्होने अपनी पुत्री और दामाद के सामने अपने दोहित्र को अपना उत्तराअधिकारी बनाने की इच्छा प्रकट की और दोनों की सहमति के पश्चात युवराज पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. सन 1166 मे महाराज अंगपाल की मृत्यु के पश्चात पृथ्वीराज चौहान की दिल्ली की गद्दी पर राज्य अभिषेक किया गया और उन्हे दिल्ली का कार्यभार सौपा गया.

पृथ्वीराज चौहान और कन्नोज की राजकुमारी संयोगिता की कहानी

पृथ्वीराज चौहान और उनकी रानी संयोगिता का प्रेम आज भी राजस्थान के इतिहास मे अविस्मरणीय है . दोनों ही एक दूसरे से बिना मिले केवल चित्र देखकर एक दूसरे के प्यार मे मोहित हो चुके थे. वही संयोगिता के पिता जयचंद्र पृथ्वीराज के साथ ईर्ष्या भाव रखते थे, तो अपनी पुत्री का पृथ्वीराज चौहान से विवाह का विषय तो दूर दूर तक सोचने योग्य बात नहीं थी. जयचंद्र केवल पृथ्वीराज को नीचा दिखाने का मौका ढूंढते रहते थे, यह मौका उन्हे अपनी पुत्री के स्व्यंवर मे मिला. राजा जयचंद्र ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्व्यंवर आयोजित किया| इसके लिए उन्होने पूरे देश से राजाओ को आमत्रित किया, केवल पृथ्वीराज चौहान को छोड़कर. पृथ्वीराज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से उन्होने स्व्यंवर मे पृथ्वीराज की मूर्ति द्वारपाल के स्थान पर रखी. परंतु इसी स्व्यंवर मे पृथ्वीराज ने संयोगिता की इच्छा से उनका अपहरण भरी महफिल मे किया और उन्हे भगाकर अपनी रियासत ले आए. और दिल्ली आकार दोनों का पूरी विधि से विवाह संपन्न हुआ. इसके बाद राजा जयचंद और पृथ्वीराज के बीच दुश्मनी और भी बढ़ गयी.

जन्म1166
मृत्यु1192
पितासोमेश्र्वर चौहान
माताकपूरी देवी
पत्नीसंयोगिता
जीवन काल43 वर्ष
पराजय मुहम्मद
गौरी से

पृथ्वीराज की विशाल सेना :

पृथ्वीराज की सेना बहुत ही विशालकाय थी, जिसमे 3 लाख सैनिक और 300 हाथी थे. कहा जाता है कि उनकी सेना बहुत ही अच्छी तरह से संगठित थी, इसी कारण इस सेना के बूते उन्होने कई युध्द जीते और अपने राज्य का विस्तार करते चले गए. परंतु अंत मे कुशल घुड़ सवारों की कमी और जयचंद्र की गद्दारी और अन्य राजपूत राजाओ के सहयोग के अभाव मे वे मुहम्मद गौरी से द्वितीय युध्द हार गए.

पृथ्वीराज और गौरी का प्रथम युध्द :

अपने राज्य के विस्तार को लेकर पृथ्वीराज चौहान हमेशा सजग रहते थे और इस बार अपने विस्तार के लिए उन्होने पंजाब को चुना था. इस समय संपूर्ण पंजाब पर मुहम्मद शाबुद्दीन गौरी का शासन था, वह पंजाब के ही भटिंडा से अपने राज्य पर शासन करता था. गौरी से युध्द किए बिना पंजाब पर शासन नामुमकिन था, तो इसी उद्देश्य से पृथ्वीराज ने अपनी विशाल सेना को लेकर गौरी पर आक्रमण कर दिया. अपने इस युध्द मे पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम हांसी, सरस्वती और सरहिंद पर अपना अधिकार किया. परंतु इसी बीच अनहिलवाड़ा मे विद्रोह हुआ और पृथ्वीराज को वहां जाना पड़ा और उनकी सेना ने अपनी कमांड खो दी और सरहिंद का किला फिर खो दिया. अब जब पृथ्वीराज अनहिलवाड़ा से वापस लौटे, उन्होने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये. युध्द मे केवल वही सैनिक बचे, जो मैदान से भाग खड़े हुये इस युध्द मे मुहम्मद गौरी भी अधमरे हो गए, परंतु उनके एक सैनिक ने उनकी हालत का अंदाजा लगते हुये, उन्हे घोड़े पर डालकर अपने महल ले गया और उनका उपचार कराया. इस तरह यह युध्द परिणामहीन रहा. यह युध्द सरहिंद किले के पास तराइन नामक स्थान पर हुआ, इसलिए इसे तराइन का युध्द भी कहते है. इस युध्द मे पृथ्वीराज ने लगभग 7 करोड़ रूपय की संपदा अर्जित की, जिसे उसने अपने सैनिको मे बाट दिया.

मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान का दूसरा विश्व युध्द :

अपनी पुत्री संयोगिता के अपहरण के बाद राजा जयचंद्र के मन मे पृथ्वीराज के लिए कटुता बडती चली गयी तथा उसने पृथ्वीराज को अपना दुश्मन बना लिया. वो पृथ्वीराज के खिलाफ अन्य राजपूत राजाओ को भी भड़काने लगा. जब उसे मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज के युध्द के बारे मे पता चला, तो वह पृथ्वीराज के खिलाफ मुहम्मद गौरी के साथ खड़ा हो गया| दोनों ने मिलकर 2 साल बाद सन 1192 मे पुनः पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया. यह युध्द भी तराई के मैदान मे हुआ. इस युध्द के समय जब पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई ने अन्य राजपूत राजाओ से मदत मांगी, तो संयोगिता के स्व्यंबर मे हुई घटना के कारण उन्होने ने भी उनकी मदत से इंकार कर दिया. ऐसे मे पृथ्वीराज चौहान अकेले पढ़ गए और उन्होने अपने 3 लाख सैनिको के द्वारा गौरी की सेना का सामना किया . क्यूकि गौरी की सेना मे अच्छे घुड़ सवार थे, उन्होने पृथ्वीराज की सेना को चारो ओर से घेर लिया| ऐसे मे वे न आगे पढ़ पाये न ही पीछे हट पाये. और जयचंद्र के गद्दार सैनिको ने राजपूत सैनिको का ही संहार किया और पृथ्वीराज की हार हुई. युध्द के बाद पृथ्वीराज और उनके मित्र चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया . राजा जयचंद्र को भी उसकी गद्दारी का परिणाम मिला और उसे भी मार डाला गया. अब पूरे पंजाब, दिल्ली, अजमेर और कन्नोज मे गौरी का शासन था, इसके बाद मे कोई राजपूत शासक भारत मे अपना राज लाकर अपनी वीरता साबित नहीं कर पाया.

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु (Prithviraj Chauhan death):

गौरी से युध्द के पश्चात पृथ्वीराज को बंदी बनाकर उनके राज्य ले जाया गया . वहा उन्हे यतनाए दी गयी तथा पृथ्वीराज की आखो को लोहे के गर्म सरियो द्वारा जलाया गया, इससे वे अपनी आखो की रोशनी खो बैठे. जब पृथ्वीराज से उनकी मृत्यु के पहले आखरी इच्छा पूछी गयी, तो उन्होने भरी सभा मे अपने मित्र चंदबरदाई के शब्दो पर शब्दभेदी बाण का उपयोग करने की इच्छा प्रकट की. और इसी प्रकार चंदबरदई द्वारा बोले गए दोहे का प्रयोग करते हुये उन्होने गौरी की हत्या भरी सभा मे कर दी. इसके पश्चात अपनी दुर्गति से बचने के लिए दोनों ने एक दूसरे की जीवन लीला भी समाप्त कर दी . और जब संयोगिता ने यह खबर सुनी, तो उसने भी अपना जीवन समाप्त कर लिया.

अपने इस लेख द्वारा हमने पृथ्वीराज चौहान के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अंशो को आपतक पहुचाने की कोशिश की है. वैसे जहा जहा भी पृथ्वीराज चौहान के जीवन का वर्णन किया है, वहा थोड़ी बहुत भिन्नता है. जैसे कुछ जगह यह बताया गया है की मुहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज के कुल 18 युध्द हुये थे, जिसमे से 17 मे पृथ्वीराज विजयी रहे. अगर आपके पास इससे संबन्धित कोई अलग जानकारी है तो हमे कमेंट बॉक्स मे जरूर लिखे.

पृथ्वीराज चौहान कहाँ के राजा थे?

पृथ्वीराज चौहान एक राजा थे, जो 11 वीं शताब्दी में 1178-92 तक एक बड़े साम्राज्य के राजा थे. ये उत्तरी अमजेर एवं दिल्ली में राज करते थे.

पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

पृथ्वीराज चौहान का जन्म सन 1166 में गुजरात में हुआ था.

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई?

गौरी से युध्द के पश्चात पृथ्वीराज को बंदी बनाकर उनके राज्य ले जाया गया, वही पर यातना के दौरान उनकी मृत्यु हो गई.

पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद संयोगिता का क्या हुआ?

कहते है संयोगिता ने पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद, लाल किले में जोहर कर लिया था. मतलब गरम आग के कुंड में कूद के जान दे दी.

पृथ्वीराज चौहान का भारतीय इतिहास में क्या योगदान रहा?

ये महान हिन्दू राजपूत राजा था, जो मुगलों के खिलाफ हमेशा एक ताकतवर राजा बन कर खड़े रहे. इनका राज उत्तर से लेकर भारत में कई जगह फैला हुआ था.

Attention! : चौहान मूलतः चाउ हूण जो कि Chinese भाषा मेंदरिन के शब्द का परिवर्तित रूप है। चौहान हूण जातियों के ही वंशज हैं। इसका पूरा विश्लेषण पढ़े । पृथ्वीराज चौहान हूण पुत्र

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