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राव तुलाराम: एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी

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दिल्ली में, आर.के. पुरम से इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और गुड़गाँव तक जाने के लिए प्रमुख सड़कों में एक है – राव तुलाराम मार्ग। दिल्ली की ट्रैफ़िक ख़बरों में किसी और मार्ग का ज़िक्र हो या ना हो, मगर राव तुलाराम मार्ग का ज़िक्र हमेशा रहता है| अगर आप थोड़ा और ग़ौर करें, तो राजस्थान के बीकानेर से लेकर दिल्ली तक ऐसे कई स्थान हैं, जहां राव तुलाराम के नाम पर कहीं मार्ग मिलेगा, तो कहीं स्कूल, कहीं चौक तो कहीं खेल का मैदान।राव तुलाराम मार्गराव तुलाराम मार्ग

राव का जन्म हरियाणा राज्य के रेवाड़ी शहर में एक शाही अहीर यादव परिवार में 09 दिसम्बर1825 को हुआ था। इनके पिता का नाम राव पूरन सिंह तथा माता का नाम ज्ञान कुँवर था। एक कुशल प्रशासक और सैन्य अधिकारी के तौर पर जाने वाले, राव का नाम जन्म के दौरान तुला सिंह अहीर रखा गया था. इन्होंने पांच बरस की उम्र से ही घुड़सवारी, शस्त्र चलाना और अन्य विषियों का अध्ययन शुरू किया था| निमोनिया के कारण पिता की मृत्यु हो जाने के बाद, राव ने 14 बरस की उम्र में ही सत्ता की बागड़ोर संभाल ली थी और इनका नाम राव तुलाराम रखा गया| इन्होंने अपना शासन हरियाणा के रेवाड़ी से चलाया और इनका राज, पूरे हरियाणा में यानी मेहन्द्रगढ़, फ़ारुख़नगर, गुरुग्राम, फ़रीदाबाद, बवाल और फ़िरोज़पुर झिरका तक फैला हुआ था|1857 की क्रान्ति1857 की क्रान्ति

1857 की गर्मियां के मौसम में, भारत में एक नयी चिंगारी भड़का चुकी थी जब बर्रैकपुर में मंगल पांडे ने विद्रोह का बिगुल बजाया और फिर, मेरठ से क्रान्ति की शुरुआत हुई. इस मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाकर राव मे, ख़ुद को स्वतंत्र घोषित करते हुये राजा की उपाधि धारण कर ली थी। राव ने 17 मई को अपने भाई राव गोपालदेव के साथ 5 हज़ार सैनिक इकट्ठे किए और उनके लिए हथियारों बनाने और प्रशीक्षण के लिए कार्यशाला की स्थापना भी की. इतना ही नहीं, राव ने आख़िरी ग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की भी भरपूर मदद की, जहां उन्होंने उनके सेनापति बख़्त ख़ान को अपने शाही ख़ज़ाने से 45 हज़ार रुपये दिये और कुछ ज़रूरी सामान के साथ-साथ गेहूं की दो हज़ार बोरियां भी दीं.नारनौलनारनौल

अपने भाई राव किरशन सिंह के साथ उन्होंने नसीबपुर- नारनौल के मैदान में अंग्रेज़ों से युद्ध किया जिसमें उनके पाँच हज़ार से अधिक क्रन्तिकारी सैनिक मारे गए थे। उन्होंने दिल्ली के क्रांतिकारियों को भी सहयोग दिया| 16 नवम्बर 1857 को, स्वयं ब्रिटिश सेना से नसीबपुर- नारनौल में युद्ध किया, और ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी | ब्रिटिश सेना के कमांडर जेरार्ड और कप्तान वालेस को मौत के घाट उतर दिया , इसके साथ कई अंग्रेज़ अधिकारी भी ज़ख़्मी हुए. मगर नाभा, कपूरथला, जींद और पटियाला सिख प्रांतों से अंग्रेज़ों के लिए सहायता आई और राव किरशन वीरगति को प्राप्त हो गए. फिर राव तुलाराम के कई सेनापति जैसे राव रामलाल, और मुहम्मद आलम भी मारे गए| नारनौल का युद्ध 1857 की क्रान्ति में सबसे महत्वपूर्ण युद्धों में से गिना जाता है, क्यूंकि इसके बाद उत्तर राजस्थान और हरियाणा में अंग्रेज़ों का पूरा कब्ज़ा हो गया था|

युद्ध के दौरान ज़ख़्मी हुए राव तुलाराम ने तातिया टोपे की फ़ौज के साथ, आगे के युद्ध की रणनीति बनाने के लिए हाथ बढ़ाया. मगर एक साल के बाद, सीकर के युद्ध में उनको भी पराजय का सामना करना पड़ा. आगे चलकर तातिया टोपे के ही साथी मानसिंह को अंग्रेज़ों ने अपने साथ मिला लिया और तातिया टोपे को 1862 में फांसी दे दी गई|दोस्त मुहम्मद ख़ानदोस्त मुहम्मद ख़ान

मगर राव ने हार नहीं मानी, राव अपनी सरज़मीं को छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे| वहां उन्होंने तत्कालीन राजा दोस्त मुहम्मद ख़ान से हाथ मिलाया| उनके सहारे, राव ने ईरान के शाह और याहां तक तत्कालीन रूसी राजा अलेक्ज़ैन्डर द्वितीय से भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए मैत्री संबंध बनाए. वहीँ वापस स्वदेश में, 1857 की क्रांति में भागीदारी के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने 1859 में राव तुलाराम की रियासत को ज़ब्त कर लिया था। परंतु उनकी दोनों पत्नियों का संपत्ति पर अधिकार क़ायम रखा गया था। सन 1877 में उनके पुत्र राव युधिष्ठिर सिंह को अहिरवाल का मुखिया बना दिया गया । राव की हार के बाद, उनके मेयो प्रतिद्वंदियों ने अहीर गाँवों में लूटमार की, जहां कुल 111 अहीरों, ब्राह्मणों और जाटों की हत्या कर दी गई|

राव अपनी मातृभूमि को स्वंतंत्र करने की कोशिश में कामयाब हो ही रहे थे, कि सेहत ने साथ देने से इंकार कर दिया और इसी बीच 37 वर्ष की आयु में, 23 सितंबर 1863 को, काबुल में पेचिश की बीमारी से उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु के 138 वर्ष बाद, भारत सरकार ने सन 2001 में उनके नाम का डाक टिकट जारी करवाया था.

तो अब की बार, जब कभी राव तुलाराम मार्ग से गुज़रना हो…तो एक महान क्रांतिकारी को याद करना न भूलें ।

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